Meri Kalam - Poem (Hindi)
की मेरी कलम लिखे तो दे
हजारों पन्ने तेरे नाम पर प्यार के
पर मेरी सिहाई का क्या भरोसा
कही छोर न दे साथ बीच राह में
अगर न भी छोर साथ तो क्या लिख पायु
पन्ने भर दिए तेरे प्यार पर अब क्या सोच पाऊं
पर मेरी कलम भी बरी जिद्दी है
लिखेगी तुझपर ही भले सिहाई सुखी है
तेरी जुबा से निकली हर लब्ज़ को इसने पन्ने पर उतार दिया है
बस तेरी मुस्कान के लिए पता नही खुद को कितना बदनाम किया है
है कलम! अब रुक जा बहुत हो गई तेरी
अब आज से राज और मर्जी भी चलेगी मेरी
पर ये बाबरा मेरी बाते कहा मनाने वाला है
निकल गया एक नया सफर पर जहा किसी और का किनारा है।
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